कुछ प्रेम मुकम्मल नहीं होते
कुछ प्रेम कभी मुकम्मल नहीं होते,
कुछ कहानियाँ चाहकर भी अपने आख़िरी पन्ने तक नहीं पहुँचतीं।
दो लोग एक-दूसरे को बेपनाह चाहते हैं,
फिर भी किस्मत उनके बीच ऐसी दूरी लिख देती है
जिसे पूरी उम्र तय नहीं किया जा सकता।
फिर वही अधूरा प्रेम जीने का सहारा बन जाता है—
कभी किसी पुरानी तस्वीर की तरह,
कभी किसी भूले हुए ख़त की तरह,
और कभी अचानक आए तुम्हारे एक संदेश की तरह।
तुम्हारा आज का एक संदेश,
मानो बुझती हुई साँसों में किसी ने फिर जान भर दी हो।
जानता हूँ, तुम मेरे साथ नहीं हो,
और शायद अब इस जन्म में हमारा मिलना भी नसीब में नहीं।
सच स्वीकार कर लिया है मैंने,
बस दिल आज भी इसे मानने को तैयार नहीं।
एक प्रेमी का हृदय भी कितना अजीब होता है—
जिसे अपना कहने का हक़ नहीं,
उसकी ख़ैरियत की फ़िक्र फिर भी सबसे ज़्यादा रहती है।
जिससे मिलने की उम्मीद नहीं,
उसके लौट आने की आहट फिर भी सुनाई देती है।
तुम्हारे लिए शायद वह संदेश कुछ शब्द भर था,
मेरे लिए वह धड़कन थी—
उस दिल की, जिसने तुम्हें खोकर भी
तुम्हें अपने भीतर से कभी जाने नहीं दिया।
शायद हमारा प्रेम साथ रहने के लिए नहीं था,
बस उम्र भर याद रहने के लिए था।
हम एक-दूसरे से प्रेम तो बहुत करते थे,
बस एक-दूसरे के हो नहीं सके।
और अब मेरी बची हुई ज़िंदगी में
तुम नहीं होगे, तुम्हारा साथ नहीं होगा—
बस तुम्हारी यादें होंगी।
और सच कहूँ…
कभी-कभी किसी के साथ पूरी ज़िंदगी जीने से ज्यादा दर्दनाक होता है,
उसके बिना पूरी ज़िंदगी उसी को याद करके जीना।
कलम सौरभ की....
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