आश्रम के बाबी देओल” कहे जाने वाले ब्रजभूषण राजपूत: जमीन से सत्ता तक का सफर

बुंदेलखंड की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने व्यवहार, संघर्ष और तेवरों के कारण चर्चा का केंद्र बन जाते हैं। ऐसे ही एक नाम हैं ब्रजभूषण राजपूत, जिन्हें हाल के दिनों में सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में “आश्रम के बाबी देओल” जैसे उपनाम से भी पहचाना जाने लगा है।

बुंदेलखंड की मिट्टी से निकला नेता

ब्रजभूषण राजपूत बुंदेलखंड की चर्चित चरखारी विधानसभा से लगातार दूसरी बार विधायक हैं। वे उस वर्ग के नेता माने जाते हैं जो सत्ता से ज्यादा जनता के बीच मौजूद रहने में विश्वास रखते हैं। स्थानीय लोग उन्हें एक जुझारू, स्पष्टवादी और टकराव से न डरने वाला जनप्रतिनिधि मानते हैं।
राजनीति उन्हें विरासत में मिली। उनके पिता गंगाचरण राजपूत बुंदेलखंड के चर्चित “लोधी राजपूत” नेता रहे। गंगाचरण राजपूत का राजनीतिक जीवन केवल सत्ता से जुड़ा नहीं था, बल्कि वे सामाजिक प्रभाव और जनाधार के लिए जाने जाते थे।
राम मंदिर आंदोलन और राजनीतिक टकराव

गंगाचरण राजपूत का नाम उस दौर से भी जुड़ा रहा जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था। उन्होंने अपनी जमीनी राजनीति के बल पर आंदोलन के प्रमुख चेहरे कल्याण सिंह के राजनीतिक प्रभुत्व को खुली चुनौती दी थी।
कल्याण सिंह उस समय लोधी राजपूत समाज के सर्वमान्य नेता माने जाते थे, और यही टकराव आगे चलकर राजनीतिक दूरी का कारण बना।
इसी कारण गंगाचरण राजपूत को बीजेपी में कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया, जबकि वे जनता दल और कांग्रेस जैसे दलों से हमीरपुर लोकसभा सीट से तीन बार सांसद बने।
2010 में वे राज्यसभा सदस्य भी रहे और अपने समाज में एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित की।

पिता की छाया, बेटे की राह

जनता के बीच रहना, सीधे संवाद करना और अफसरशाही से आंख में आंख डालकर बात करना—यह शैली ब्रजभूषण राजपूत ने अपने पिता से विरासत में पाई।
पिता की छत्रछाया में उन्होंने वही डोर-थामे रखी, लेकिन समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें बीजेपी का दामन थामने की ओर मोड़ा।
आज वे बीजेपी से चरखारी विधानसभा के लगातार दो बार विधायक हैं और क्षेत्र में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।

व्यवहार कुशलता या बेबाकी?

ब्रजभूषण राजपूत की पहचान एक व्यवहार कुशल नेता के रूप में भी रही है, लेकिन यही बेबाकी कई बार विवाद का कारण बन जाती है।
हाल ही में जब जनता से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा सामने आया और उनकी बात नहीं सुनी गई, तो उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह के सामने खुले मंच पर सवाल खड़े कर दिए।

इस दौरान:

विभागीय अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे
• मंत्री के सामने ही समस्याओं की फेहरिस्त रखी गई
• और मामला मीडिया की सुर्खियों में आ गया
बीजेपी जैसी अनुशासित पार्टी में इस तरह का सार्वजनिक विरोध अनुशासनहीनता माना जाता है, लेकिन ब्रजभूषण राजपूत के समर्थक इसे जनता की आवाज बनने का साहस कहते हैं।

जनता के जरिये दबाव की राजनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना इसलिए भी अलग है क्योंकि
यह पहली बार देखने को मिला जब किसी विधायक ने अपनी बात मनवाने के लिए सीधे जनता को माध्यम बनाया और मंत्री को सार्वजनिक रूप से कठघरे में खड़ा किया।
यही वजह है कि उनका यह अंदाज
समर्थकों को ईमानदार संघर्ष लगता है
और विरोधियों को पार्टी लाइन से बाहर जाना

विवादों के बीच उभरती पहचान

आज ब्रजभूषण राजपूत केवल एक विधायक नहीं, बल्कि
सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय
मीडिया के लिए हेडलाइन
और बुंदेलखंड की राजनीति में एक तेज आवाज बन चुके हैं
“आश्रम के बाबी देओल” जैसा उपनाम उनके रफ-टफ, जमीनी और एंग्री-मैन इमेज को दर्शाता है, जो मौजूदा दौर की राजनीति में अलग पहचान बना रहा है।

निष्कर्ष

ब्रजभूषण राजपूत का राजनीतिक सफर यह दिखाता है कि
सिर्फ पद से नहीं, बल्कि तेवर, विरासत और जनता से जुड़ाव से नेता बनता है।
उनकी राजनीति पसंद की जाए या न की जाए, लेकिन यह तय है कि वे खामोश रहने वालों में नहीं हैं।
बुंदेलखंड की राजनीति में उनका यह अंदाज आगे चलकर
पार्टी के लिए चुनौती बनेगा या ताकत,
यह आने वाला समय तय करेगा।

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