तुम मेरे लिखे शब्द नहीं, उनका अर्थ हो…
मैं पत्र लिखूँ,
तुम पढ़ लेना…
मैं शब्द लिखूँ,
तुम समझ लेना।
और अगर मेरे शब्दों के बीच
कहीं कोई ख़ामोशी मिल जाए,
तो उसे भी पढ़ लेना—
क्योंकि कुछ बातें
स्याही से नहीं लिखी जातीं,
वे आँखों से बहती हैं
और गंगा में जाकर
अपना पता खो देती हैं।
अगर कभी लिख दूँ “सुकून”,
तो काशी के उन घाटों को समझ लेना
जहाँ शाम उतरते ही
गंगा की लहरों पर
सूरज अपनी आख़िरी रोशनी छोड़ जाता है।
उसी रोशनी की तरह
तुम भी मेरी ज़िंदगी में आई थीं—
थोड़ी देर के लिए,
मगर इतनी गहराई तक उतर गईं
कि तुम्हारे जाने के बाद
मेरे भीतर का कोई सूरज
फिर कभी नहीं उगा।
अगर लिखूँ “प्रेम”,
तो काशी समझ लेना…
क्योंकि काशी को
सिर्फ़ देखा नहीं जाता,
उसे भीतर उतरकर जीना पड़ता है।
ठीक वैसे ही
जैसे तुम्हें चाहना था।
तुम्हें पाने की चाह में
मैंने खुद को खो दिया,
और तुम्हें खोने के बाद
खुद को ढूँढते-ढूँढते
उम्र गुज़र गई।
अब कोई पूछता है—
“तुम इतने ख़ामोश क्यों रहते हो?”
मैं कैसे बताऊँ
कि जिस इंसान से
सबसे ज़्यादा बातें करनी थीं,
उसी के जाने के बाद
बात करने को कुछ बचा ही नहीं।
अगर कहीं लिख दूँ “इंतज़ार”,
तो गंगा की उन सीढ़ियों को समझ लेना
जो सदियों से
लोगों को आते-जाते देखती रही हैं।
कोई आया,
किसी ने दीप जलाया,
किसी ने अपने प्रिय के लिए प्रार्थना की,
किसी ने अस्थियाँ बहाईं,
और कोई लौटकर कभी नहीं आया…
मैं भी उन्हीं सीढ़ियों जैसा हूँ—
आज भी वहीं बैठा हूँ,
जहाँ तुमने आख़िरी बार
मुझे छोड़कर जाने का निर्णय लिया था।
वक़्त बहुत आगे निकल गया,
मगर मेरा इंतज़ार
आज भी वहीं बैठा है।
तुम शायद भूल गई होगी
वह तारीख़,
वह शाम,
वह रास्ता…
मगर मेरा दिल
आज भी उस पल से आगे नहीं बढ़ा।
अगर लिखूँ “विरह”,
तो मणिकर्णिका को समझ लेना।
वहाँ रोज़ कितने शरीर जलते हैं,
कितनी कहानियाँ राख होती हैं,
कितने रिश्ते
अग्नि के हवाले कर दिए जाते हैं…
लेकिन मैंने वहाँ जाकर जाना—
हर चीज़ जलती नहीं है।
कुछ प्रेम
चिताओं से भी अधिक ज़िद्दी होते हैं।
शरीर राख हो जाता है,
नाम मिट जाता है,
चेहरा तस्वीरों में कैद रह जाता है,
मगर किसी की याद
मन के भीतर ऐसी जगह बना लेती है
जहाँ मृत्यु भी पहुँच नहीं पाती।
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने भी बहुत कुछ जलाया है—
तुम्हारे पत्र,
तुम्हारी तस्वीरें,
तुम्हारी दी हुई छोटी-छोटी चीज़ें,
तुम्हारा नाम मिटाने की कोशिश में
कितनी ही रातें…
मगर अजीब बात है—
सब कुछ जल गया,
बस तुम नहीं जलीं।
तुम आज भी
मेरे भीतर उसी तरह जीवित हो
जैसे गंगा में
डूबा हुआ कोई दीप
कुछ देर बाद फिर
लहरों के ऊपर दिखाई दे जाता है।
अगर लिखूँ “दर्द”,
तो मेरी मुस्कान समझ लेना।
क्योंकि दुनिया ने
मेरे चेहरे पर हँसी देखी है,
मेरी आँखों के पीछे
जलता हुआ शहर नहीं।
मैंने लोगों से कहा—
“मैं ठीक हूँ।”
और हर बार
मेरे भीतर कुछ टूटकर
गंगा में गिरता रहा।
तुम्हें शायद कभी पता भी नहीं चला
कि तुम्हारे बाद
मैंने कितनी बार
अपने ही कमरे की ख़ामोशी से पूछा—
“आख़िर मेरी कमी कहाँ थी?”
कोई जवाब नहीं आया।
बस रात आई,
खिड़की से चाँद उतरा,
और मेरी आँखों के नीचे
एक और रात छोड़ गया।
अगर लिखूँ “मौन”,
तो मेरी आँखों को पढ़ लेना।
इन आँखों ने तुम्हें
इतना पुकारा है
कि अब आवाज़ देने की
हिम्मत नहीं बची।
अब तुम सामने आ भी जाओ
तो शायद मैं कुछ न कहूँ।
बस तुम्हें देखता रहूँगा…
क्योंकि जिनसे प्रेम बहुत गहरा हो,
उनसे शिकायतें भी
एक दिन थक जाती हैं।
और फिर बचता है सिर्फ़
एक ख़ामोश प्रेम—
जो कहता कुछ नहीं,
माँगता कुछ नहीं,
बस भीतर कहीं
तुम्हारे होने की
एक छोटी-सी लौ बचाए रखता है।
और अगर कभी कोई पूछ बैठे—
“प्रेम की परिभाषा क्या है?”
तो मेरी कविताएँ मत पढ़ना।
काशी मत जाना।
गंगा के घाट मत देखना।
मणिकर्णिका की आग मत देखना।
किसी विरह में डूबे इंसान की आँखें मत पढ़ना।
बस…
एक बार खुद को देख लेना।
अगर तुम्हें अपनी आँखों में
किसी ऐसे इंसान की परछाईं दिखाई दे
जिसके बिना भी तुम जी रही हो,
मगर जिसके बिना
तुम्हारा कोई हिस्सा
आज भी अधूरा है—
तो समझ लेना…
वही प्रेम है।
क्योंकि मेरे लिए प्रेम
कभी मिल जाना नहीं था।
प्रेम तो वह था
जब तुम्हारे साथ रहते हुए
मैंने तुम्हें अपना संसार समझ लिया।
और विरह वह था
जब तुम चली गईं
और मुझे पता चला
कि संसार के चले जाने के बाद भी
इंसान साँस लेता रहता है।
बस जीता नहीं।
तुम्हारे बाद
मैंने साँसें तो बहुत लीं,
मगर ज़िंदगी कम जी।
काशी आया तो लगा
शायद यहाँ आकर
तुम्हारी याद से मुक्ति मिल जाएगी।
गंगा के सामने बैठा
तो समझ आया—
गंगा भी तो वही करती है…
जो कुछ उसका होता है,
उसे अपने साथ बहा ले जाती है,
मगर उसकी याद
किनारों पर छोड़ जाती है।
तुम भी चली गईं…
अपने साथ
मेरा बहुत कुछ बहा ले गईं।
बस एक चीज़ छोड़ गईं—
तुम्हारी याद।
और अब वही मेरी सज़ा भी है,
वही मेरी प्रार्थना भी,
वही मेरा विरह भी,
और शायद…
वही मेरा सबसे सच्चा प्रेम भी।
इसलिए अब अगर मैं लिखूँ
“काशी”,
तो समझ लेना—
मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ।
अगर लिखूँ “गंगा”,
तो समझ लेना—
मैं अपने आँसू छुपा रहा हूँ।
अगर लिखूँ “मणिकर्णिका”,
तो समझ लेना—
मैं अपने भीतर कुछ जला रहा हूँ।
अगर लिखूँ “विरह”,
तो समझ लेना—
तुम आज भी मेरे भीतर हो।
और अगर कभी लिख दूँ—
“प्रेम”
तो किसी शब्दकोश में
उसका अर्थ मत ढूँढना…
बस मेरी आँखों में देख लेना।
क्योंकि मैंने जो कुछ लिखा,
वह कविता नहीं थी।
वह तुम्हारे जाने के बाद
मेरे भीतर बची हुई
तुम्हारी आवाज़ थी।
मेरे शब्द मेरे थे,
मेरी कलम मेरी थी,
मेरी स्याही मेरी थी…
मगर—
हर शब्द में तुम थीं,
हर ख़ामोशी में तुम थीं,
हर आँसू में तुम थीं,
हर प्रार्थना में तुम थीं।
और आज भी…
मैं जब गंगा के किनारे बैठकर
अपनी हथेलियों में थोड़ा-सा पानी भरता हूँ,
तो उसे बहाने से पहले
एक पल के लिए
तुम्हारा नाम याद करता हूँ।
फिर पानी छोड़ देता हूँ…
इस उम्मीद में नहीं
कि तुम लौट आओगी।
बल्कि इसलिए कि
कुछ प्रेम
पाने के लिए नहीं होते—
कुछ प्रेम
उम्र भर खोए रहने के लिए होते हैं।
और शायद…
मेरी हथेली की आख़िरी लकीर तक
तुम्हारा नाम नहीं होगा,
मगर मेरी आख़िरी कविता तक
तुम्हारा अर्थ ज़रूर रहेगा।
— कलम सौरभ की…
Tags
kalam_saurabh_ki....