“प्रेम जो पहाड़ काट दे”


कभी ऊँचाइयों ने रास्ता रोका, कभी चट्टानों ने बहाव को मोड़ने की कोशिश की, मगर प्रेम… वह ठहरा कहाँ करता है, प्रिय?
वह तो अपना रास्ता आँसुओं से भी बना लेता है।
नदियाँ भी शायद प्रेमियों जैसी होती हैं—
टूटती हैं, बिखरती हैं, पत्थरों से टकराकर घायल होती हैं,
कभी अपना रास्ता खो देती हैं,
मगर फिर भी हर मोड़ पर उसी एक मंज़िल का नाम लिए बहती रहती हैं— समुद्र।
शायद प्रेम भी ऐसा ही होता है…
जिसे रोकने के लिए दुनिया कितनी ही दीवारें क्यों न खड़ी कर दे,
जिसके भीतर किसी को पाने की सच्ची तड़प हो,
वह हर दीवार में एक दरार ढूँढ़ लेता है।
इतिहास ने भी यही देखा है—
जहाँ दुनिया ने पहाड़ खड़े किए,
वहाँ किसी दशरथ माँझी ने हथौड़ा उठा लिया।
क्योंकि जब प्रेम ज़िद नहीं, इबादत बन जाता है,
तब हथेलियों के छाले भी रास्तों का नक्शा बदल देते हैं।
सुनो प्रिय…
अगर तुम्हारे दिल में भी मेरे प्रेम के बीच कोई पहाड़ खड़ा है,
तो उसे समाज ने बनाया हो,
परिस्थितियों ने बनाया हो,
या तुम्हारे अपने अहम ने…
एक बार उसे मेरे प्रेम की बारिश में भीगने देना।
शायद वह पहाड़ भी टूट जाए,
शायद तुम्हारे भीतर जमी बरसों की नाराज़गी बह जाए,
शायद तुम्हारी आँखों में छिपे वे आँसू
जिन्हें तुमने मुझसे हमेशा छुपाया,
एक दिन मेरे कंधे पर आकर ठहर जाएँ।
मैं आज भी उसी नदी की तरह तुम्हारी ओर बह रहा हूँ…
थक चुका हूँ चट्टानों से टकराते-टकराते,
कई बार बिखरा हूँ, कई बार खुद को समेटा है,
मगर तुम्हें पाने की चाह आज भी उतनी ही निर्मल है।
तुम्हें शायद लगता होगा कि मैं आगे बढ़ गया हूँ,
तुमसे दूर होकर मैंने तुम्हें भुला दिया है…
मगर सच तो यह है कि
नदी रास्ता बदल सकती है,
अपनी मंज़िल नहीं।
मैंने भी रास्ते बदले हैं,
खुद को समझाने की कोशिश की है,
तुम्हारी यादों से बचकर निकलने की कोशिश की है…
मगर हर रास्ता घूमकर
फिर वहीं आकर रुक जाता है—
जहाँ तुम खड़ी हो।
बस इतना याद रखना, प्रिय—
प्रेम रास्ता माँगता नहीं,
अपना रास्ता बना लेता है।
और अगर दो दिल सच में एक-दूसरे के लिए धड़कते हों,
तो दूरी उन्हें और गहरा कर सकती है,
वक्त उन्हें और तड़पा सकता है,
दुनिया उनके बीच पहाड़ खड़े कर सकती है…
मगर सच्चे प्रेम को हमेशा के लिए कैद नहीं कर सकती।
क्योंकि पहाड़ चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो,
प्रेम की एक छोटी-सी धारा
उसे सदियों में घिसकर रास्ता बना देती है।
और शायद हमारा प्रेम भी
उसी नदी की तरह है—
जो तुमसे दूर होकर भी
हर दिन तुम्हारी ओर बहता है…
क्योंकि कुछ प्रेम मंज़िल पाने के लिए नहीं,
पूरी उम्र किसी एक नाम की ओर बहते रहने के लिए होते हैं।
— कलम सौरभ की ✍️
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