तुम्हारी याद आज फिर आई, प्रिय…
और हम फिर उसी तरह तड़प उठे,
जैसे कोई सूखा हुआ ज़ख्म
बरसों बाद फिर से भीग जाए
और अपनी पूरी पीड़ा के साथ
धड़कने लगे।
कुछ दर्द थे
जिन्हें हमने समय की धूल में दबा दिया था,
कुछ सवाल थे
जिन्हें हमने अपने ही दिल में दफ़्न कर दिया था—
मगर आज तुम्हारी याद ने
सबको फिर से कुरेद दिया।
हमारे रिश्ते के बीच
अफ़वाहों की एक नदी बह निकली थी—
नदी इतनी गहरी नहीं थी
कि हम उसे पार न कर सकते,
और न ही उसका किनारा इतना दूर था
कि हम एक-दूसरे तक पहुँच न सकते…
मगर हम दोनों
सच से ज़्यादा
लोगों की कही हुई बातों को सुनते रहे।
तुम एक किनारे खड़ी रहीं,
हम दूसरे किनारे पर…
हम दोनों एक-दूसरे को देख सकते थे,
शायद महसूस भी कर सकते थे,
मगर बीच में बहती उस नदी का शोर
हमारे शब्दों से अधिक तेज़ था।
हम पुकारते रहे—
“एक बार हमारी बात सुन लो…”
शायद तुमने भी कहा होगा—
“बस एक बार मेरी आँखों में देखकर पूछ लो…”
मगर हमारी आवाज़ें
लहरों के शोर में डूबती रहीं।
और फिर एक दिन
वह माझी भी नज़रों से ओझल हो गया,
जिसे हम दोनों ने
एक-दूसरे तक पहुँचने की उम्मीद समझ रखा था।
तब समझ आया, प्रिय…
माझी के जाने का दुख इतना नहीं था,
जितना इस बात का था कि
हम दोनों में से किसी ने भी
एक-दूसरे तक पहुँचने के लिए
उस नदी में उतरने की कोशिश नहीं की।
बस अफ़सोस यही है—
नदी अफ़वाहों की थी,
किनारे हमारे अपने थे,
नाव हमारी उम्मीद थी…
और डूब गया
हमारा रिश्ता।
आज भी कभी तुम्हारी याद आती है
तो दिल उसी नदी के किनारे पहुँच जाता है—
हम अब भी एक किनारे पर हैं,
तुम शायद दूसरे किनारे पर…
बस फर्क इतना है, प्रिय—
पहले हम तुम्हें पाने के लिए
नदी पार करना चाहते थे,
और अब…
उस पार तुम्हें देखकर भी
चुपचाप लौट आते हैं।
क्योंकि अब डर नदी की गहराई से नहीं,
उस दर्द से लगता है
कि कहीं फिर से
हमारे बीच
अफ़वाहों से भी गहरी
कोई और दूरी न बह निकले।
— कलम सौरभ की
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