मेरे धैर्य की अंतिम परीक्षा मत लो, प्रिय.....


मेरे धैर्य की अंतिम परीक्षा मत लो, प्रिय…

मैंने जब-जब प्रेम के रास्तों पर चलकर तुम तक पहुँचने की कोशिश की,
हर बार तुम्हें पाने के दरवाज़े
उसी रास्ते पर बंद दिखाई दिए।

फिर भी मैंने हार नहीं मानी…
रास्तों के किनारे खड़े उन पीपल और बरगद के पेड़ों को देखा
और उनकी शाखाओं पर अपनी मन्नतों के धागे बाँध दिए।
हर मंदिर की चौखट पर श्रद्धा से सिर झुकाया,
हाथ जोड़कर न जाने कितनी प्रार्थनाएँ कीं—
बस तुम्हें पाने के लिए।

तुम मिलीं…
और तुम्हारा प्रेम भी मिला।
शायद यह विधाता ने निश्चित किया था
कि हमारी राहें एक-दूसरे से मिलेंगी,
कि हम एक-दूसरे के प्रेम को जानेंगे,
एक-दूसरे के बिना अधूरे होने का अर्थ समझेंगे।

लेकिन शायद विधाता ने यह नहीं लिखा था
कि तुम मेरे साथ
जन्म-जन्मांतर तक रहोगी।

हमारा प्रेम निश्चित था, प्रिय…
मगर हमारा साथ अनिश्चित।

तुमसे बिछड़कर
मैंने सिर्फ़ तुम्हें नहीं खोया,
मैंने अपनी पहचान खो दी,
अपना वजूद खो दिया,
अपने भीतर का वह इंसान भी कहीं पीछे छोड़ आया
जो कभी तुम्हारे प्रेम में
पूरी तरह जीवित हुआ करता था।

अब न तुमसे कोई शिकायत है,
न ईश्वर से कोई प्रश्न।
बस मेरे भीतर एक शांत-सा स्वर रह गया है
जो हर प्रार्थना में
तुम्हारा नाम दोहराता है।

मैं आज भी ईश्वर के सामने सिर झुकाता हूँ,
मगर अब तुम्हें माँगने के लिए नहीं…
अब मैं तुम्हारी खुशियों के लिए प्रार्थना करता हूँ।

और शायद अनंत काल तक करता रहूँगा—
चाहे इस जन्म में तुम्हारा साथ न मिला हो,
चाहे प्रेम का यह अधूरापन
मेरी पूरी उम्र का विरह बन गया हो।

क्योंकि तुम मेरी प्रार्थनाओं का वह हिस्सा हो, प्रिय…
जिसे मैं तुम्हारे न होने पर भी
ईश्वर से अलग नहीं कर सकता।

तुम जहाँ भी रहो, खुश रहो…
और अगर कभी मेरी याद तुम्हें छू जाए,
तो बस इतना समझ लेना—

कोई है जो तुम्हें पाने की मन्नतों से आगे बढ़ चुका है,
और अब तुम्हारी सलामती के लिए
ईश्वर से अनंत काल तक प्रार्थना करता है।


कलम सौरभ की.....
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