कुछ प्रेम
मिल जाने से कहाँ पूरे होते हैं…
कुछ प्रेम तो
बिछड़ने के बाद ही
अपनी असली गहराई दिखाते हैं।
वे साथ नहीं रहते,
मगर उम्र भर
सीने में धड़कते रहते हैं।
और तुम…
तुम मेरे जीवन की
वह अधूरी कहानी हो,
जिसे लिखते-लिखते
मेरी उम्र गुज़र गई,
मगर जिसका आख़िरी पन्ना
आज भी कोरा पड़ा है।
तुम्हें खोने का दुख
सिर्फ़ इतना नहीं
कि तुम मेरे साथ नहीं हो…
दर्द तो यह है
कि तुम मेरे भीतर
आज भी उतनी ही मौजूद हो,
जितनी उस दिन थीं
जब मुझे तुम्हें खोने का डर
ज़रा भी नहीं था।
तुम मेरी वह याद हो
जिसे भुलाने की हर कोशिश
तुम्हें मुझमें
और गहरा उतार देती है।
तुम वह विरह हो
जो आँखों से नहीं बहता,
बस भीतर उतरकर
हर साँस को भारी कर देता है।
कभी-कभी लगता है
तुम्हें भूल भी जाऊँगा…
फिर कोई शाम ढलती है,
कोई पुराना गीत बजता है,
हवा तुम्हारी तरह छूकर गुजरती है—
और मैं फिर उसी जगह खड़ा मिलता हूँ
जहाँ तुम मुझे छोड़कर गई थीं।
शायद प्रेम की सबसे बड़ी सज़ा यही है—
जिसे हम सबसे अधिक चाहते हैं,
उसी के बिना जीना सीखना पड़ता है।
और मैंने भी सीख लिया है…
बस एक बात आज तक नहीं सीख पाया—
तुम्हारे बिना खुश रहना।
तुमसे शिकायत नहीं है मुझे,
शिकायत तो अपनी किस्मत से है
जिसने तुम्हें मेरी ज़िंदगी में तो भेजा,
मगर मेरी ज़िंदगी में
रहने की मोहलत नहीं दी।
और सबसे दर्दनाक सच यह है—
मैं आज भी तुम्हें चाहता हूँ…
उतना ही,
जितना उस दिन चाहता था
जब तुम्हें चाहना
सिर्फ़ प्रेम था…
मुझे कहाँ पता था
कि एक दिन
यही प्रेम मेरी सबसे गहरी पीड़ा बन जाएगा।
अब तुम्हें पाने की ज़िद भी नहीं,
बस इतना चाहता हूँ
कि जब कभी
मेरी याद तुम्हारे दिल के दरवाज़े पर दस्तक दे,
तो उसे अजनबी समझकर
लौटा मत देना।
क्योंकि वह मेरी याद नहीं होगी…
वह उस आदमी का आख़िरी हिस्सा होगा
जो तुम्हें खोने के बाद भी
उम्र भर तुम्हारा ही रहा।
और अगर कभी
मेरी कहानी का आख़िरी पन्ना लिखा गया,
तो शायद वहाँ भी
तुम्हारा नाम ही होगा…
क्योंकि कुछ प्रेम
अंत की प्रतीक्षा नहीं करते—
वे अधूरे रहकर भी
पूरी उम्र प्रेम करते रहते हैं।
और तुम…
तुम मेरी वही अधूरी कहानी हो
जिसका अंत लिखने की
हिम्मत मेरी कलम में आज भी नहीं।
क्योंकि तुम्हारी कहानी खत्म करना
मेरे लिए तुम्हें खोना नहीं…
अपने भीतर बचे आख़िरी प्रेम को
दफ़ना देना होगा।
— कलम सौरभ की…